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दुआ
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ऐ खासऐ खासाना रुसुल वक्ते दुआ है।
उम्मत पे तेरी आके अजब वक्त पड़ा है।
वह दीन, हुई बज्मेजहॉंं जिसमे चिरागा ।
अब उसकी मजालिस में न बत्ती न दीया है॥

जिस दीन की हुज्जत से सब अदयान थे मगलूब ।
अब मोतेरज इस दीन पे हर दीन पे हर हरजा सरा है ॥

जो तफरके अकवाम के आई थी मिटाने ।
उस कौम में तफ़रका आके पड़ा है।

छोटो में इताअत हैे, न शफ़क्क्त है बड़ों में ।
प्यारों में मोहब्बत है न यारों वफ़ा हैं ॥

दौलत है न इज्ज्त न फ़जाीलत न हुनर है ।
इक दीन है बाकी सो बे बर्ग व नवा है ॥

वह कौम के आफाक में जो सर बफलक थी ।
वह याद में असलाफ की अबरू बकजा है ॥

जो कौम के मालिक थे उलूम और हक्म की ।
अब इल्म का वॉ नाम न हिकमत का पता है ॥

तदबीर सम्हलने की हमारी नहीं कोई ।
मॉ एक दुआ तेरी की मकबूल खुदा है ॥

(ख्वाजा अल्ताफ हुुुसैन हाली रह)






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