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फलाह व बहबूदी
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अल्लाह तआला का फरमान हैं कि इंसान जिस सिम्त कदम बढ़ाता हैं उसके लिए वही राह आसान कर दी जाती हैं। एक शख्स जो ईमान की राह पर चलता है,नमाजें अदा करता है, बुराईयों से बचता है उसके लिए तमाम काम आसान हो जातें हैं । बुराईयों का इरतेकाब उसके लिए तकरीबन मुमकिन नहीं रह जाता, भलाई उसकी फितरत बन जाती हैं । इसी तरह एक वह शख्स जो जुल्म व ज्यादती, चोरी, डाका और आवारागर्दी को अपना शआर बना लेता है उसके लिए नेकियों की राह पर चलना सख्त दुश्वार होता है इसकी वजह ये नहीं कि वह बुरे भले की तमीज नहीं रखता । वह जानता है कि ये सब बुरे काम हैं, दुनिया और आखेरत दोनो में इसकी सख्त सजा हे लेकिन चूंकि बुराई उसकी आदत बन गर्ई इसलिए इस रास्ते से हटना उसके लिए मुहाल हो जाता है ऐसी सुरत में जरूरत सिर्फ एहसास और एहतेसाब का जज्बा पैदा करने की है। जरा गौर करें कि अपके इर्द गिर्द कितने ऐसे इंसान है जिन्हें आपकी मदद की जरूरत है । आपकी थोड़ी सी तवज्जोह, आपके अपने वक्त और आराम की थोड़ी सी कुरबानी उनकी का रूख बदल सकती हैं ।

हम मुसलमान ये यकीन रखते हैं कि आज जो कुछ हमारे पास हैं, जिंदगी, सेहत, ईल्म, अक्ल और दौलत सब कुछ अल्लहतआला की अताकर्दा नेमतें हैं और हम इन नेमतों के अमीन हैं। जिस तरह एक अमीन हर अमानत के निए जवाबदेह है उसी तरह हमें भी अल्लाहतआला के सामने एक दिन जवाब देना होगा कि हमनें इन सलाहियतों, तवानाईयों और दौलत को कहां-कहां सर्फ किया। ये नेमते इसलिए नहीं हैं कि हम सिर्फ अपनी जात तक महदूद रखें बल्कि इसके मुस्तहिक बिलातफरीक मजहब व मिल्लत तमाम जरूरतमंद अफराद हैं । ऐसे इंसानों को हर दौर में जरूरत रही है जसे इंसानियत को समझें और दुसरों और दूसरों की भलाई के लिए जद्योजहद करें । जाहिर है ये जद्योजहद कोई आसान काम नहीं हैं इसके लिए जज्बे कुर्बानी की जरूरत होती है ।
इसमें अपना वक्त, आराम माल और सब ही कुछ शामिल हैं । अल्हम्दुलिल्लाह ये तसव्वुर हौसला अफजाई है कि हर दौर में अल्लाह के ऐसे बंदे रहें हैं जिन्होंने इस जद्योजहद की दुश्वार राहों का खैर मकदम किया है और मआशरे की इस्लाह और इंसानियत की भलाई के लिए शब व रोज+ मेहनत की है अपनी जिंदगी को कुर्बानी का नमूना बनाया हैं ।

इल्म और दौलत इंसानी जिंदगी की दो बुनायादी जरूरतें हैं । इल्म के जरिए ही हम अपने रब यानि अपने खालिक को पहचानते हैं और इल्म की बदौलत ही आज दुनिया हर रोज नई ईजादात से रौशनास हो रही है । इसी तरह दौलत का दर्जा है । इमाम शोरी का कौल है गुरबत में ईमान भी बिक जाता है । इस्लाम में हुदूदे दौलत की कोई कैद नहीं लेकिन हुसूले दौलत के लिए हुदूदे मुतययमहै । हराम और हलाल का दायरा हैं। बदकिस्मती से आज आम हिन्दुस्तानी इल्म और दौलत दोनों में पिछड़े हैं । तालीमी ऐतेबार से भी वह पसमान्दा है और एकतेसादी ऐतेबार से भी वह बहुत नीचलर सतह पर है । ये भी एक हकीकत है कि गुरबत और जेहालत का चोली दामन का साथ है। आज भी मुसलमानों का एक तबका इल्म को अहमियत नहीं देता। ऐसे लोगों के दरम्यिान इल्म की अहमियत का एहसास बेदार और एकतेसादी दुश्वारियों को दुर करने में मदद करना वक्त की एक अहम जरूरत है ऐसी तंजीमें और अफराद जो कौम की
बेहतरी के लिए काम कर रहें हैं उन्हें आला तालीम के साथ अपने बच्चीयों को हुनरमंद बनाने पर भी तवज्जोह करना चाहिए।

इब्तेदायी तालीम तो हर बच्चे का बुनियादी हक है, लिहाजा हमारी कोशिश रही हो कि कोई बच्चा अपने इस बुनियादी हक से महरूम न रहे । दुसरी तरफ उन्हें हुनरमंद बनाने की तरबियत दी जाए ताकि बड़े होकर वह खुद अपनी किफालत कर सकें ।








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