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इकबाल का नजरिये तालीम


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ईल्म का बुनियादी मकसद अमले स्वालेह और खौफ खुदा है। यानि जो ईल्म इंसान के दिल में ख्ुादा का खौफे और अमले स्वालेह की तहरीक पैदा करता है और उसे अमल व तजुर्बे से एनुल यकीन तक पहुंचाता है वह असल औरे बुनियादी ईल्म है । इस मक्सद को सामने रखकर जो शख्स ईल्म हासिल करता है वही हरक,हरारत,नूर और माद्ये के मुमकेनात पर काबू पाकर अपनी रूहानी कुव्वत को बढ़ाता है। ऐसे ही शख्स को हकीकी लज्जत हासिल होती है। इसमें अज्तेहाद व जिद्दत की सलाहिसत पैदा होती है। वह आसमानो के सीने चीर कर राज हाए सरबस्ता को ढ़ू+ॅॅॅढ निकालता है। फितरत में अपनी ईमाई कुव्वत से इजाफा करता है और खुदा और ख्ुादी दोनों की मारफत हासिल करता हैं।

दरअसल इस दुनिया में इंसान की तख्लीक का मकसद यही है कि वह कायनात और फितरत पर गौर व फिक्र करके ख्ुादा और ख्ुादी को पहचाने और उनको मस्खर करे । कुरआन ने लोगों को बार-बार ये दावत दी है और साफ लफ्जों कहा है कि जो कुछ आसमानों और जमीन में है वह सब तुम्हारे ताबे फरमान हैं । इन पर गौर व फिक्र करके अपनी शख्सियत की नशो व नुमा करो ? यही वह ईल्म है जिन को नबीएकरीम ने इल्मे नाफे से ताबीर किया है और ऐसे ईल्म से पनाह मांगी है जो फायदेमंद नहीं है। इतना ही नहीं बल्कि रिसालतमाब ने इस इल्म का सीखना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज करार दिया हैं । दूसरी जगह आप ने इरशसद फरमाया 'ईल्म सीखो और लोगो को सिखाओ' । इस की भी बुनियादी वजह यही है कि इंसान में खौफे खुदा और अमले स्वालेह की तहरीक इल्म
नाफा ही से पैदा होती इसलिए इसका सीखना और सिखाना जरूरी है और अगर इस रास्ते में मुश्किलात व मसाएब आएं तो उन्हें खंदापेशानी से झेलना चाहिए।
रहा सवाल दुनियवी उलूम का तो उनका हूसूल न फर्ज है और न ही जरूरी अलबत्ता मुस्तहसन और मतलूब है। चुनांचे हस्बे जरूरत इंसान उसे भी सीख सकता है । लेकिन इसकी तहसील से पहले इल्म नाफेअ या इल्मे हकीकी का सीख लेना और फर्ज लाजमी है । इसलिए कि अगर दुनियवी उलूम इस इल्में हकीकीके ताबे हो जाए तो वह नफा बख्श हो जाते हैं और जिस इल्म का इस सच्चाई से रिश्ता टूट जाता है तबाही व बर्बादी का सबब बन जाता है ।

इकबाल के नजरिए तालीम की इमारत इसी बुनियाद पर कायम है चुनांचे वह ख्वाजा गुलामुल सैययदैन के नाम अपने एक खत में इसकी वजाहत इस तरह करते है - 'इल्म में मेरी मुराद वह ईल्म है जिसका दारोमदार हवास पर है । असमतौर से ईल्म का लफज इन्ही मायनों में इस्तेमाल किसा है । मगर ईल्म,ईल्में हक की इब्तेदा है। वह ईल्म जसे शऊर में नहीं समा सकता और जो ईल्म हक की आखरी मंजिल है, इसी का दूसरा नाम ईश्क है ।'

इकबाल के नजदीक ईल्म वही है जो इंसान की जिदगी की हिफाजत हिफाजत करे । इसकी इरतेका पर मायल करे और इसकी खुदी को मुस्तहकम व मजबूत बनाए -

ईल्म अज सामाने हिफ्जे जिंदगी अस्त।
ईल्म अज असबाबे तकवीम खुदी अस्त॥
ईल्म व फन अज पेशे खीजाने हयात।
ईल्म व फन अज खाना जादाने हयात॥

जर्बे कलीम में एक जगह हैं कि जिस ईल्मका दीन से रिश्ता मुनकता हसे जाता है,वह ईल्म,ईल्म नहीं बल्कि जेहालत है। सच्चा ईल्मवही है जो दीन के ताबे हो। यही ईल्म इंसान के दिल और उसकी निगाह की हिफाजत करके उसे गलत रवी और गलतकारी से रोकता है और हजरत इब्राहीमकी तरह अपने बुतो को खुद पाश-पाश करके रख देता है। ईल्म हकीकी ऐसा ठोस ईल्म है जो जमाने की तब्दीली के साथ अपनी शकल व सूरत नहीं बदलता लिहाजा ये बहस ही बेकार है कि फलॉ ईल्मेकदीम हैं और फलॅा जदीद।कदीम व जदीद की ये बहस दरअसल कमनजरी की दलील हैं। वह लोग जो हकायक से बेखबर है वही अक्सर इसमें उलझते हैर्ं। सच पूछो तो हकीकी ईल्म में कदीम व जदीद के मुबाहसे की कोई गुंजाईश नहीं होती। वह इस हकीकत को एक माद्दी मिसाल से इस तरह करते है कि गुंचे की तरबियत और उसकी नशो व नुमा इस वक्त तक मुमकिन नहीं है जब तक नसीम सहर के साथ कतरए शबनम की आमेजिश न हो। बिलकुल इसी तरह दुनियवी उलूम इस वक्त तक मंफअत बक्ष्श नहीं हो सकते जब तक इल्म हकीकी से उस का ताल्लुक न हो। वह बड़े एतेमाद से आखीर में ये कहते हैं कि याद रखों जिस दुनियवी उलूम में मादियात के साथ रूहानियत या मुशाहेदाते हुक्म (अक्ल) के साथ तजल्लियाते कलीम (इल्हाम) न हो वह इल्म जामे और अकल हरगिज नहीं हो ाकता और न ही ऐसे इल्म से मआशरे को फायदा पहुॅचा सकता हैं:

वह ईल्म अपने बुतो का है आप इब्राहीम ।
किया है जिसको खुदा ने दिल व नजर का नदीम॥
जमाना एक, हयात एक, कायनात भी एक।
दलीले कम नजरी किस्सए जदीद व कदीम ॥
चमन मे तरबियते गुन्चा हो नहीं सकती ।
नहीं है कतरए शबनम अगर शरीके नसीम॥
वह ईल्म, कम बसरी,जिस मे हम किनार नहीं।
तजल्लियाते कलीम व मुशाहदाते हकीम ॥


















 
   
   

 

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