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मआच्चीविज्ञाम
इस्लाम और तहजीबी कच्च्मकच्च
(किच्चन पटनायक, तर्जुमा-सनाउल्लाह)
'किच्चन पटनायक उड़ीसा के एक इच्च्तेराकि मुफक्किर और कायद हैं । ये लोहियावादी (डॉं. राम मनोहर लोहिया के अपकार के हामी) लीडर हैं । वह इंसान के बुनियादी मसाइल में सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान को ही शुमार नहीं करते बल्कि मजहब और तहजीब को भी इंसानी जिन्दगी का लाजमा तसव्वुर करते है। उनका इस्तेकाल २००४ में हुआ । हसबे जैल तकरीर किच्चन पटनायक ने २९ अगस्त २००४ को राचीं में एक प्रोग्राम में की थी । इसमें उन्होंने मजहब और मजहबी गैर जानिबदारी की तच्चरीह की थी । हैटींगटन की मच्चहूर किताब (तहजीबों का टकराव) के जिमन में उन्होंने आज के दुनिया में इस्लाम किस तरह अमेरिकी ईस्तेमारियत और पूरी दुनिया के मआच्ची निजाम को चैलेंज दे सकता है । इस सिलसिले में तफसीली बहस की थी । कुरआन में सूद के ममनू होने की बुनियाद पर दौरे जदीद में बिलासूदी मआच्ची निजाम का तसव्वुर इस तकरीर की खुसूसियत है । इस मच्चहूर तकरीर को टेप की मदद से तहरीर में मुन्तकिल किया गया । जनवरी २००५ के हिन्दी माहनामा 'सामायिक वार्ता' में ये तकरीर शाया हुई है । उनकी तमाम बातों से इदारे को मुत्तफिक होना जरूरी नहीं है।'
आज की तकरीर में मेरे लिये एक मौका है कि आज के लिये जो मौजू मुतय्यन हैं, इस पर मैं अपनी बात सूना सकॅूं और इसके बाद आप लोगों की राय भी सूनों । उसके हिसाब से मुसलमान या मुस्लिम गिरोह एक इकाई है । ये इकाई धरम की वजह से बनती है । ये पहचान धरम की वजह से बनती है । ये च्चिनाख्त धरम के सबब कायम होती है । अब ये सवाल अक्सर उठता है कि धरम की पहचान होनी चाहिए या नहीं ? धमर को लेकर एक अलग इकाई बननी चाहिए या नहीं ? जात-पात (गिरोही इनफरादियत) को लेकर अलग पहचान बननी चाहिए या नहीं ? ये धरम जात तो सारी दुनियां में और जात-पात तो भारत के समाज के शऊर की, ऐसी वाजेह और ठोस हकीकतें हैं, सच्चाई ये है कि इसका इंकार नहीं किया जा सकता । न जात-पात का इंकार किया जा सकता है और न धरम का इंकार किया जा सकता है । ये हमारी इजतेमाई जिन्दगी की एक सच्चाई है । एक सवाल तो हो गया कि इंकार किया जा सकता है या नहीं । दूसरा सवाल उठता है कि क्या इंकार करना चाहिए ? जात-पात के बारे में तो हम फौरन कह देंगे जात-पात की पहचान का इंकार करना चाहिए । जात-पात ऐसा एक पुराना इदारा है, समाजी ओर सकाफती इदारा, जिसकी इब्तेदा कभी कोई मुस्बत जरूरत रही होगी, नहीं भी रही होगी, लेकिन जदीद हिन्दुस्तान में इसकी मुसबत जरूरत नहीं है ।
धरम के बारे में नुक्तएनजर
सिवाए इसके कि एक बहुत दिनों से चले आ रहे इस्तहसाल के अमल को, तकरीक कमे अमल को इसके जरिये निच्चान जद करने का एक आला हैं । जब हम जात पात कहते है तो इसका यही मायनी होना चाहिए कि बहुत दिनों चले आ रहे एसे समाजी सकाफती अमल जो आदमी को, इंसानी मआच्चरे को, कौमी समाज को आला तबके और अदना तबके में तकसीम करता हैं । इसी लिए इसकी सच्चाई को तसलीम करते हुए भी, क्यों जैसे हम इस्तहसाल के अलम की सच्चाई का इंकार नहीं कर सकते, हमें चाहिए कि इसको मिटाएं, जात पात का रिवाज हिन्दुस्तान समाजीं निजाम का एक लाजमी जुज हो गया है । किसी एक धरम से इसका तालुक नहीं रह गया है । जात पात का रिवाज हिन्दु समाज का अतिया हैं, लेकिन भारत में जैसे की ईसाई मजहबी समाज, मुस्लिम मजहबी समाज हैं, इसमें भी उसको कबुलीयत हासिल है । वैसे देखें तो हिन्दू धरम के, जिसको हिन्दू धरम कहते हैं, क्यों कि हिन्दू धरम को आसानी से समझाया नहीं जा सकता हैं, बुनयादी ग्रथों में जात पात का रिवाज नहीं है, लेकिन हिन्दू समाज जिन शास्त्रों को मानता हैं, इसमें जात पात का रिवाज हैं । इसमें जिसका बयान हैं, इसका कोड हैं, इसके कवानीन हैं, इसके मंत्र हैं, इसके मंत्र हैं, इसके तरीके हैं, तो हिन्दुस्तान के हर एक धार्मिक समाजी इकाई में इसका दखल हो चुका हैं । ये कुरआन के जरिये, बाईबिल के जरिये ताईद कर्दा नहीं हैं, फिर भी और हिन्दु समाज में इसे तसलीम नहीं किया गया हैं,मगरवहअमलनहै।

धरम की जो पहचान हैं, धरम की बुनियाद पर इनफेरादी पहचान है, उसके बारे में वह नुकतये नजर नहीं हो सकता हैं जो जात पात के बारे में हो सकता हैं धरम एक अलग ढंग की सच्चाई हैं, लिहाजा इंसानी गिरोह से नहीं कहा जा सकता हैं कि आप धरम छोड़ दे इस तरह बात नहीं बनती हैं। ज्यादा से ज्यादा जो हो सकता, वह भी बहुत महदूद दाएरे में, यह कि आप धरम तब्दील कर दे, धरम बदलने का एक बहुत बड़ा वाक्या जदीद हिन्दुस्तान की तारीख में हुआ, जब अम्बेडकर ने इस जात पात की तफरीक तंग आकर अपने हमनवाओं के साथ बौद्ध धर्म कुबूल कर लिया । जात पात की तफरीक के चलते दलितों में जो गुस्से का उबाल आया, उस जात पात के खिलाफ, छुआ छुत के खिलाफ जल्द ही एक वक्त आ गया, एक मंजिल आ गयी, जब डाक्टर अम्बेडकर को कहना पड़ा कि हिन्दु समाज में रहते हुए हम आजाद नहीं हो सकते हैं । हम बराबर नहीं हो सकते हैं । हम अछुत हैं, हम हिन्दु धरम में पैदा हुए क्योंकि इस पर मेरा कोई इखतेयार नहीं था लेकिन हिन्दु धरम में रहते हुए मैं मरूंगा नहीं । ये डॉक्टर अम्बेडकर का कहना था । ऐसा कहने के बहुत दिनों के बाद तक डॉक्टर अम्बेडकर ने फिर ऐलान नहीं कि मैंने इस धरम को छोड़ दिया या दूसरे धरम एख्तेआर कर लिया बाद में १९५८ में इन्तेकाल के कुछ ही दिन पहले, या कुछ ही माह पहले, जैसे की उन्होंने कहा कि मैं हिन्दु रहते हुए नहीं मरूंगा उन्होंने धरम तबदील करने का एैलान किया। हर एक हिन्दु को ये बात याद रखनी चाजिए ! बस, उन्होंने बहुत दिनों की सोंच और गौर व फिक्र के अमल के बादयह तय किया कि उनको बौद्ध होना है । जब उन्होंने ये फैसला किया कि बौद्ध होना हैं तो हिन्दुओं को तसल्ली देने के लिए एक बात कही । उन्होंने हिन्दुओं से कहा कि देखों, मैं हिन्दु समाज को छोड़ रहा हूं । मैंने छोड़ दिया और फिर कई लोग हैं मेरे साथ, लेकिन मैंने ऐसा रास्ता अपनाया हैं कि, जिसकी मुखालेफत नहीं होनी चाहिए या नहीं हो सकती हैं, सबसे नजदीक जो हिन्दुओं के लिए हो सकता हैं वहीं मैं एख्तेयार कर रहा हूं, बस धरम की बात अलग हैं । अब अम्बेडकर की बात ही ले लीजिये उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया और तफरीक के एक बहुत ही गैर इंसानी इदारे के लिखाफ बगावत करते हुए उन्होंने एक धरम को अपनाया ।
हमारी अपनी राय है कि बौद्ध धर्म को बिलकुल हटा कर हिन्दु धर्म का कोई जयादा काबिज एहतेराम मुकाम नहीं बनता । हिन्दू समाज को अगर धरम के लायक बनाया हैं धरम के तौर पर जीनत बख्शा हैं तो उसकों बौद्ध को अपनाना ही होगा । वैसे कुछ रिवायात और एकदार में अपनाया गया हैं । बौद्ध को एक शख्स के तौर पर अपनाया गया हैं लेकिन फलसफा और उसूल के तौर पर नहीं । हमारा मुद्दा ये है कि हिन्दू, बौद्ध को फलसफे के तौर पर अपनाये, एक अजीब शख्सियत के तौर पर नहीं ।

 

धरम की इंफेरादी पहचान ज्यादा ठोस इसलिए हैं कि कहीं न कहीं कम से कम मुझे लगता हैं कि धरम को छोड़कर बाकी जितने भी इजाफे हैं, जितने अकसाम के फलसफे हैं उनमें ये नहीं हैं । जैसे इल्म की सबसे जयादा इस वक्त मोअज्जिल शकल है साईन्स, इल्मे तिब्बियात, तिब्बियाती उसूल । इसके मुताल्लिक जयप्रकाच्च नारायण ने, जो सख्तगीर मार्क्सवादी थे, १९५२ में खुदएहतेसाबी की, पाकीजगी व तजकिया का व्रत किया और एलान कर दिया कि मैने माद्दपरस्ती को छोड़ दिया । मार्क्सी फलसफा का नाम होता है''जयदियाली माद्दियत''। उन्होंने कहा कि मैंने जदलियत को तो नहीं छोड़ा लेकिन माद्दपरस्ती को छोड़ दिया । क्यों छोड़ दिया ? इस बारे में उन्होंने माद्दियत पर बहुत कुछ कहा, क्या जदीद साईस हमें अच्छा होने का जज्बा देता है ? सच्चाई का जज्बा देता है ? ईमानदारी का जज्बा देता है ? क्या जदीद साईस और तिब्बियाती उलूम किसी फर्द को, किसी इजतेमाईयत को अच्दे होने का जज्बा, सच्चे होने का जज्बा, ईमानदार होने का जज्बा देता है ? इसका जवाब कोई 'हां' किसी शकल में दे, मुझे इस वक्त उम्मीद नहीं है । तो फिर कौन दे सकता है ? सिर्फ धरम ही देता है । ये बात नहीं है कि आप किस धरम के हो जाएं, आप ईसाई हो जाएं, आप मुस्लिम हों जाएं, आप हिन्दू हो जाएं, आप बौद्ध हो जांए तो आप सच्चे हो जाएंगे, ईमानदार हो जाएंगे लेकिन इंसान को सच्चा होना चाहिए, इंसान को ईमानदार होना चाहिए अच्छा होना चाहिए, दूसरे इंसान का भाई होना चाहिए, ये तो सिर्फ धरम ही सिखाता है । अभी तक सिखाता आया है और किसी ने सिखाया नहीं ।
अच्छे होने की, ईमानदार होने की, सच बोलने की वैसी सीख और किसी ने इंसानी समाज को सैकड़ों सालों से नहीं दी है, जैसे कि धरम ने दी है । धरम में बहुत ढकोसला हो गया है, धरम में बहुत खराबियां हो गई, धरम में तानाच्चाही आ गई, धरम में तंगनजरी और तोहमात ने डेरा डाल लिया, इन सबके बावजूद धरम की जो ये खूबी है, इसके चलते कोई फर्द और कोई जमात इस वक्त धरम को नहीं छोड़ सकता । बहुत कोच्चिच्चे करके सिर्फ कोई शख्स ही धरम और खुदा को छोड़ सकता है, लेकिन कोई जमात या गिरोह धरम को नहीं छोड़ सकता। दुनिया को खुदाबेजार अफराह की जरूरत है । मैं खुद चाहता हूं कि इनकी तादाद बढ़े, जो खुदाबेजार है, बगैर धरम के उसूलों पर अमल किये खुदा को आप मानें, दूसरे इंसान को भाई समझें, आप सच बोलें, ईमानदार हों, किसी के साथ बेईमानी ना करें, ऐसा नमूना बगैर धरम को माने, बगैर खुदा को माने, कुछ लोग पेच्च करें तो बेहतर है, क्योंकि जो धरम में खराबियां हो रही है, उनसे धरम में ढकोसले और दिखावे बढ़ रहे हैं । खुदाबेजार अफराद की तादाद होगी तो इसके लिये एक चैलेंज होगा । तो धरम एक अनोखी विरासत है, इसके साथ-साथ खुदाबेजार लोंगो की भी जरूरत है । इन दोनों को मिलाकर देखना होगा ।
मुतय्यन तौर पर धरम के कुछ लाजवाल उसूल होतें हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि धरम की हर एक चीज लाजवाल हो जाएगी । खासकर, ये जो कायनात की सच्चाई है कि इंसान का दूसरों के साथ, दूसरों का मतलब कोई भी जानदार हो सकता है, माद्दा हो सकता है, फितरत हो सकती है । सच्चा बरताव, सच्चा अमल व सलूक है, सच्चे धरम में ही है । अलग-अलग धरम, अलग-अलग अल्फाज में इस बात का ऐतेराफ करते हैं । कोई कहता है कि वह ब्रम्हा ही हर क में है, न कि सिर्फ इंसान में है, न सिर्फ जानदार में है, बल्कि माद्दा में भी है, दरख्त में भी है। बाईबिल की जबान में है कि तखलीफ का आगाज कैसे हुआ? मखलूक कैसे वजूद में आई ? इंसान के उपर कौन है ? इंसान के बाहर कौन है ? इस फलसफे से हम रोजमर्रा की हिन्दगी में कैसा काम करेंगे ? घर के अंदर कैसा काम करेंगे ? बच्चों, बूढ़ों से कैसा ताल्लुक होगा ? क्या क्या काम करने होंगे इंसान को ? छोटे काम भी, बड़े काम भी, सब के बारे में उसुल बनाने की मसूबा बनाने की कोच्चिच्च के चलते जितने बड़े धरम इस देच्च में, दुनिया में हैं, सबका एक कामिल व हमागीर ढांचा बना हुआ हैं ।
जो धरम के मानने वाले हैं, वह धरम के इस हमागीर ढांचे को नहीं जानते और कुछ धर्मो में तो ऐसा हैं कि इसके एक हिस्से में जाओं तो लगेगा ि कवह दूसरे हिस्से से टकराता हैं । धरम का एक पहलू दूसरे पहलू से टकराता हैं । ऐसा भी है लेकिन अन्दर का ये टकराव जिन्दगी की एक अलामत ही है । कभी कभी अच्छे धरम में कभी कभी बुराई के मायनी में, जिन्दगी जहां हैं, वहां अन्दर का टकराव भी होगा । कच्च्मकच्च होगी, खैर जो भी, धरम का अभी कोई बदल नहीं है । इंसान की ईजतेमाई जिन्दगी के लिए धरम का अभी तक कोई नैमुलबदल नहीं है । ऐसा भी मैं नहीं कह सकता कि कभी नहीं होगा, हो सकता हैं, जो खुदाबेजार हैं, उनकी तरक्ती होगी, अगर वह जदीद माद्दीयत से बंध नहीं जाएंगे तो उनको लेकर आगे कुछ नई तामीर हो सकती है ।
इस्लाम और आलमगीर इस्तेमारियत

 

ये मुसलमान गिरोह क्यों हैं? इसका तो बहुत बयान हो सकता हैं, लेकिन आज कि दुनिया में जो कुछ भी हो रहा हैं इसके जिमन में ये याद रख्ना पड़ेगा कि मुसलमान गिरोह दुनिया का एक जबरदस्त गिरोह हैं । हिन्दू धरम के बारे में लोग बहुत बड़ाई कर सकते हैं । सबसे बड़ाई में बौद्ध धर्म की कर सकता हूं, लेकिन जबसे मुझे इल्म हुआ सैमुअल हैनटैनगटन की किताब द्यब्सेंी ब्पअपसप्रंजपवदेष् के बारे में, तब से दुनिया के मुसलमानों के तई मेरा अहतेराम का जज्बा बहुत बढ़ गया । सैमुअल हैनटैनगटन की किताब काफी पहले छप चुकी थी। लेकिन ११ सितंबर को अल्कायदा का एक छोटा सा हमला अमेरिका की एक इमारत पर हुआ, तब वह खूब चार्च में आ गई । हमला बहुत सख्त था, लेकिन यूरोप और अमेरिका ने जो हमले का पैमाना बनाया, जदीद तहजीब के जदीद दौर में, उसके सामने ये क्या हैं? एक छोटा सा हमला, एक छोटी सी खरोंच, लेकिन इतनी बड़ी चीज बना दि गई और उस धमाके की रोच्चनी की सैमुअल हैनटैनगटन की किताब एक मच्चहूर आलम हो गई की दुनिया में आइंदा जो कच्च्मकच्च और टकराव होगा वह तहलीबों के दरम्यिान होगा, इस ड्रामें अहम मुसबत किरदार यूरोप और अमेरिका के ईसाई होगें और बदमाच्च और मुखालिफ गिरोह के तई एहतेराम बहुत बढ़ गया । मेरे लिए मुसलमान का मतलब भारत का अकलीती मुसलमान नहीं रह गया । अगर मुसलमान एक च्चिनाख्त हैं तो हिन्दुस्तानी मुसलमान मेरे लिए अहम नहीं है। मेरे लिए अहम हैं दुनिया का मुसलमान यानि अमेरिकी इस्तेमारियत को, सफेद इस्तेमारियत को, गोरे ईसाई समाज की इस्तेमारियत को अगर कही से चैलेंज का खतरा हैं तो मुसलमानों से । इसका मुकाबला मुसलमानों को ही करना पड़ेगा ।
तो क्या मुसलमान इसके लिए तैयार हैं ? अभी वह इस्तेताअत नहीं रखते । अमेरिकी इस्तेमारियत का जवाब अल्कायदा नहीं हो सकता, बिनलादैन नहीं हो सकता ओर इक्का दुक्का बम बाजी नहीं हो सकती हैं । मुसलमानों के पास जो दो हथियार हैं, उनका इस्तेमाल अभी तक नहीं हुआ हैं । एक हथियार है तेल, दूसरा हथियार है कुरआन । या उल्टा कहुंगा एक हथियार हैं कुरआन दूसरा तेल । दुनिया में जितने भी पेट्रोलियम के जखायर हैं, उनमें से सबसे बड़ा हिस्सा उन मुल्कों में हैं जहॉं मुसलमानों का कंट्रोल हैं । लेकिन तेल का इस्तेमाल क्या होगा ? इसका मआच्ची असर क्या होगा निजाम क्या होगा ? इसकी इफादियत क्या होगी ? इसका फैसला मुसलमान नहीं करता हैं और न ही कोई मुस्लिम कौम (हुकूमत) करत हैं, न कोई मुस्लिम दानिच्च्वर कर सकता हैं, न कोई इंजीनियर करता हैं । इसका फैसला अमेरिका करता हैं, यूरोप करता हैं कि तेल का इस्तेमान कैसे होगा । तेल खत्म होने वाला है । जदीद दौर में यूरोप अमेरिका की कयादत में जो तेल का इस्तेमाल है, उस इस्तेमाल पर सनती तहजीब (औद्योगिक संस्कृति) कायम हैं ।
दरअसल माद्दी जिन्दगी पूरी मजहबी जिन्दगी का ही एक हिस्सा हैं । जो धरम मानता हैं उसको ये समझना होगा कि धरम का मतलब खुदा के लिए मुनाजात नहीं हैं । धरम का मतलब खुदाई उसूलों को माद्दी जिन्दगी में लागू करना हैं, लेकिन माद्दी जिन्दगी का नक्च्चा, माद्दी जिन्दगी के उसूल कवानीन तयच्चुदा हैं । आज यूरोप के इंजीनियर सियासी लीडर और वहां की कम्पनियां माद्दी जिन्दगियां क्या होगी, तय करती हैं, कि हम 'कोकाकोला' पीयेंगे या पानी पीयेंगे या कुछ और खाएंगे, नहीं आएंगे, ये सारा कुछ वहीं तय होता हैं हमारा तेल हमारे पास हैं, लेकिन इसका क्या इस्तेमाल होगा, ये दूसरा कोई तय करता हैं और ये तेल खत्म होने वाला हैं, इस तेल के खत्म होने से अमेरिका बच नहीं जाएगा, लेकिन कहीं कहीं से जानकारी मिलती हैं, पूरी जानकारी तो कही से नहीं मिलती हैं, कि पहले मुसलमान मुल्कों का तेल खत्म होगा, इसके बाद गोरे मुल्कों का तेल खत्म होगा । यानि एक अरसे मिलेगा, जबकि दुनिया भर को दूसरे ढंग से ढालने के लिए जदीद तहजीब को ही एक नया मोड़ देते हुए एक नया नक्च्चा दुनिया का बना लेंगे । तो जो ये तेल खत्म होगा पहले मुसलमानों के मुल्को में होगा । इसके लिए मुसलमान क्या कर रहा हैं ? कुछ नहीं कर रहा हैं । इसकी कोई हिकमत अमली नहीं । इसकी सियासी मनसूबा बंदी नहीं हैं ।

 

होना यह चाहिए कि तेल का इस्तेमाल इतना न हो जितना अमेरिका चाहता हैं । तेल का निकलना, बैरल में बेचना, ये कम होना चाहिए । रोजाना का औसत कम होना चहिए । ये ध्यान रहे कि पेट्रोल महफूज रहे । इस तरह सारफियत बढ़ रही हैं, इतनी मारा मारी हो रही हैं इसकी रफ्तार में ही एक कमी आ जाएगी । पेट्रोल की पैदावार आप जीतनी कम कर देंगे, जदीद तहजीब का जो हरकती पहलू हैं, हड़बड़ी वाला पहलू हैं, मारपीट वाला पहलू हैं, वह कम हो जाएगा । रफ्तार कम हो जाएगी, तो फौरन तहजीब को आप एक दूसरे के मेयार पर ले आ सकते हैं । सिर्फ तेल की खपत को कम कर ले । लेकिन हो क्या रहा हैं ? भारत या जो हिन्दू और मुसलमानों का मुल्क हैं, या साऊदी अरब हैं जो सिर्फ मुस्लिम आबादी वाला मुल्क हैं, वहां हो क्या रहा हैं ? ये सभी अमेरिकी तहजीब व सकाफत को एख्तेयार कर रहें हैं, जिसके लिए पेट्रोल की खपत हो रही हैं । पेट्रोल का ज्यादा इस्तेमाल बड़ाते जाते हैं, पैदावार बड़ाते जाते हैं।
दुनिया में अभी दो खनिजों की जो सबसे ज्यादा ऐहमियत हैं । एक पेट्रोल और दूसरा हैं बॉकसाईट । एल्यूमिनियम और लोहे का दर्जा पीछे चला गया हैं । कुछ दहाई पहले लोहे का जो मुकाम था, अभी एल्यूमिनियम का हो गया हैं । इस लिए दुनिया में जितनी भी पेट्रोल की खानें हैं, दुनिया में बॉक्साईट की खानें हैं, सब जगह आलमी बैंक के जरिये यूरोप और अमेरिका की मल्टीनेच्चनल कम्पनीयां वहॉॅं कब्जें की मनसूबाबन्दी कर चुकी हैं । वह झारखंड की बॉक्साईट खानें हों या उड़ीसा की, सूडान की तेल खानें हों या इन्डोनेच्चिया का हिस्सा जो अगल हो गया । ये इलाके ऐसे हैं जहां तेल का जखीरा बहुत हैं और अभी पूरी पैदावार का दौर शुरू नहीं हुआ हैं । सूडान मुसलमानों का मुल्क है और तेल का मुल्क हैं, सूडान में इस वक्त क्या चल रहा है ? सूडान का एक हिस्सा दूसरे हिस्से पर बढ़कर हमला कर रहा है । सूडान का जो अरबी हिस्सा है वह गैर अरबी हिस्से का कल्ल, जिना बिलजब्र सब कुछ कर रहा है ।
ये जो होता हैं, अफ्रीका के मुल्को में होता है । भारत के सूबों में होता है इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं? हमारे दूरे बिगाड़ की वजह से, हमारी अकल की कमी की वजह से होता हैं। जरूर होता हैं, अगर सूडान में इस तरह की बरबरियत की जंगे होती हैं, खानाजंगी होती हें, अगर मड़ीपुर में ऐसा वाक्या होता, जैसे आज कल हो रहा हैं, कच्च्मीर में हो रहा हैं, तो सबसे पहले इसके मुजरिम हम हैं, हमारा धरम हैं, हमारी तहजीब हैं, हमारी अकल हैं । धरम मुकाबला नहीं कर पा रहा है । हमारी तहजीब मुकाबला नहीं कर पा रही हैं । हमारी अकल मुकाबला नहीं कर पा रही है, लेकिन खेल किसका हैं ? हमारी अकल की कमी हैं । हमारे धरम की कमी हैं, क्यों की हम जात पात की रस्म को मानते हैं, तकसीरी सुबाईयत को मानते हैं, लेकिन खेल अमेरिका यूरोप का, सूडान में वहीं खेल हैं, कच्च्मीर में वही खेल हैं । कहीं हीरे के लिए तो कहीं सोने के लिए । कहीं पेट्रोल के लिए लोगों को नच्चे में मुबतेला किया जा रहा हैं । पूरा मुल्क इस बीमारी में जकड़ा हुआ हैं, नच्चे में डुबा हुआ हैं । आज दुनिया में सवाल हैं कि हम इसका मुकाबला कैसे करें ? जो सबसे बड़ी जमियत हैं, मुसलमान, वह मुकाबला कैसे करें ? इस तीसरी दुनिया को देखें । इस्तेमारियत के खिलाफ खड़ी हुई दुनिया को देखे तो मुसलमानों की तादाद ज्यादा हैं । हिन्दूअकलीयत में हैं, इसको भी याद रखे । कभी इस पर गौर हो सकता हैं। आलमी पैमाने पर तो मुसलमान हमारा बड़ा भाई हैं, अगर अमेरिकी इस्तेमारियत से लड़ना हैं ओर हिन्दुस्तानी सियासत के संदर्भ में मुसलमान हमार छोटा भाई हैं । अगर धरम की पहचान हो तो, एक है तेल और दूसरा है कुरआन, जो धरम ग्रंथ है । जो बुनियादी और असली धरम ग्रंथ होता है उसकी कई सतहें होती हैं । इंसान अपनी अकल से उसको रूबएअमल लाता है । इसका जज्बस कहीं और से मिलता है, ये अलग चीज है लेकिन इसको अमलीजामा पहनाने का काम इंसान अपनी अकल से करता है । कुरआन के किस हिस्से को, गीता के किस हिस्से को, उपनिषद के किस हिस्से को, बाईबल के कि जुज को हम ज्यादा अहमियत देंगे, किस हिस्से को अबदी और अटल मानेंगे, किस हिस्से को छोड़ने कि भी ख्वाहिच्च करेंगे, इसकी तफ्सील तो कुरआन में नहीं दी गई । इंसान को खुद ही इस अमल को अंजाम देना होगा। इस तावील और तादील के मुताबिक इसको लागू करना होगा ।
आज की इस्तेमारियत से लड़ने के लिये कुरआन में एक अजीब उसूल (महामंत्र) है । एक ड़ेढ महीने पहले मुसलमानों ने मुझक एक तकरीर की दावत दी थी, उस तकरीर का उनवान था ''गैर सूदी निजामें मईच्चत'' । इसकी बुनियादी तालीम कुरआन में है । अगर इसको निजामें मईच्चत की बुनियाद मान लें तो आपके सारे जो बैंको में निजाम हैं, बदल जाएंगे । आपके जो आलसी बैंक और बैनुलअकवानी मालियाती फंड है, ये इदारे बदल जाएंगे । सरमायादारी ढांचा बदल जाएगा । आज की दुनिया का निजामें मईच्चत, इस निजामें मईच्चत के दोनो हिस्से कर्ज की बुनियाद पर कायम हैं, क्मइज इेंमक यानि कर्ज पर मुबनी । कर्ज का एक नतीजा अमेरिका और यूरोप में निकलता है, दूसरा नतीजा एच्चिया और अफ्रीका में मिलता है । वह कर्ज के राजा हैं, हम कर्ज में डूबे हुएं है और इस कर्ल की बीमारी का इलाज कुरआन में है कि पैसे से पैसा नहीं बना सकते हैं । ये मजहब के खिलाफ है, गुनाह है, हराम है । अगर पैसे से पैसा बनाना है तो कुछ मेहनत करो, कुछ तिजारत करो, कुछ मजदुरी करो, कुछ पैदावार करो तब पैसे बनाओ सिर्फ पैसे से पैसा सूद के सहारे बनता है, जो हराम है मुनासिब ढंग से, सीधे ढंग से कुरआन ये कहता है । आज एक तो कर्ज की क्या खौफनाक सूरते हाल है, इसे हम रोज देख रहे हैं । अगर हिसास है तो खुदकच्चियां बढ़ रही हैं । अपने देच्च में एन.डी.ए. (नेच्चपल डेमोक्रेटिक एलाइन्स) के बाद यू.पी.ए. (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाइन्स) आ गया । फिर भी आन्ध्रप्रदेच्च, कर्नाटक वगैरह में खुदकुच्ची का सिलसिला जारी है । कर्ज में डूबे किसानों के साथ भी गैर किसानों में भी ये सिलसिला चल रहा है । बंग्लोर में कुछ खुदकच्चियां हो चुकी है । इनमें ज्यादातर कर्ज से मुताल्लिक है । अगर कुरआन की नज्मेंमईच्च्त के उसूल को लागू करने के लिए कुछ अकवास व मुमालिक शऊरी तौर पर यकसू हों जाएं तो निजाम सरमायादारी (सूदखोरी का निजाम) बदल जाएगा या फिर खत्म हो जाएगा या बुनियादी तौर से तब्दील हो जाएगा ।

 

 

 

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