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उर्दू के लिये फरयाद
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उर्दू हमारी गंगा जमुना तहजीब की पहचान है।
उर्दू हिंदोसतांन में ही जन्मी और परवान चढ़ी
कौम का तारीखी,समाजी, और मज+हबी सरमाया उर्दू
में ही है और इस सरमाये की हिफाजत करना हमारा
कौमी फरीजा है। इसकी हिफाजत उसी वक्त सकती है
जब हम और हमारे बच्चें उर्दू बोलें,उर्दू
पढ़ें,उर्दू लिखेंं।
हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों को उर्दू जरूर
पढ़ायें। अगर स्कूलों में उर्दू पढ़ाने का माकूल
इंतेजाम न हो तो हम अपनें घरों में, मदरसों या
नाईट क्लासों में अपने बच्चों को उर्दू पढ़ायें
।
गांधीजी ने कहा था - ÷हमारे मुल्क की कौमी
जबान हिंदुसतांनी होनी चाहीये और हर शहरी को
दोनों रूसुमुलखत (लिपी) - उर्दू और देवनागरी
सीखनी चाहिए÷ ।
जो बच्चें नववीं क्लास में दाखेंला ले चुके
हैं उनको बहैसियन एक मजमून उर्दू जरूर लेना
चाहिये। सरकार ने भी यह सहुलत दी है कि जिस
क्लास में दस बच्चे उर्दू लेना चाहेेंगे वहां
एक मास्टर (टिचर) का इंतेजाम किया जायेगा ।
इसके अलावा तमाम कारोबारी और नौकरी पेशा अफराद
को दी चाहिए कि वह अपने इश्तेहाराम पोस्टर,
बैनर्स, साईन बोर्ड , नेम प्लेट, लेटर हेड,
विजिटिंग कार्ड वगैरह चाहे हिंदी में या
अंग्रेजी में बनवायें उसमें उर्दू जरूर शामिल
करें।
मौलाना अबुलकलाम आजाद ने कहा था - ' अगर किसी
कौम को खत्म करना हो तो उसकी जबान खत्म करदो
'।
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने बच्चों को उर्दू
से दूर रखकर अपने ही हाथों अपनी तहजीब
और कौम का गला घोंट रहे हैं ? जरा सोचिए ?
तहजीब जबान से पहचानती जाती हैं उर्दू से
तगाफुल तहजीब का खात्मा है ।
उर्दू की नई नस्ल को तैयार करना हम सबका
अव्वलीन फर्ज है। बच्चों की सलाहियतें उनकी
मादरी जबान उर्दू से उभरती है - घरों में
बेहतर उर्दू तालीम कीजिये।
इस्लाम और हिंदुस्तानी मुसलमानों की तहजीब का
सरमाया सिर्फ उर्दू में ही है - इसलिये हर
मुसलमान को उर्दू जानना जरूरी हैं । उर्दू
रूसूमुल खत जाने बगैर आप अपनी रूह को पहचान नहीं
सकतें।
उर्दू जबान का तहफ्फुज आपकी शख्सियत का
तहफ्फुज हैं ।
उर्दू सीखीये - आपकी और आपकी तहजीब की शनाख्त
है ।
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