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वक्फ
हिन्दुस्तान में औकाफ का तारीखी पसमन्जर
(मो.याहया आरिफ कुरैच्ची,एडव्होकेट,सिवनी(म.प्र.)
दावत-ए-दीन,इस्लाह मुआच्चरा, मिल्लीवमुल्की और आलसी मसाएल के साथ खिदमते खल्क भी आखिरत में निजात और दुनियावी फलाहवबहबूह का जरिया । इसलिए इस्लाम में खिदमते खल्क को बड़ी अहमियत हासिल है । खिदमते खल्क इंसानी फितरत ( प्रकृति ) का जुज ( अच्चं) है । मॉं, बाप, बीबी, बच्चे, अजीजोंअकारिब, यतीम, बेवा, मिस्कीन, खदित, माजूर पड़ोसी और मोहलले वालों से मुहब्बत और खैरख्वाही एक इंसानी जज्बा भी है और फितरी तकाजा भी । इस जज्बे को जिंदा और मजबूत रखने के लिए इस्लाम में काफी जोर दिया गया है। इस मकसद के लिए जान, माल, जायजाद वक्फ करने का मुसलमानों में रोजे अव्वल से जज्बा रहा है । अवकाफ में माअच्चरति ( समाजी ), तालीमी और तहजीबी तरक्की की गैरमामूली वुसअत पायी जाती है । मुखतलिफ अगराजवमकासिद के लिए उम्मत के दर्दमन्द हजरात ने बेच्चकीमती जायदादें मिल्लत की फलाहवबहबूद के लिए वक्फ की ओर यह सिलसिला अभी भी जारी है ।
हिन्दुस्तान के मौजूदा अवकाफ को अगर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाये तो भारत में मुस्लिम हुकूमतों के दौर में मुगलों और सुल्तानों ने अपनी बेच्चूमार जायदादें वक्फ की थी । मुसलमानों की मजहबी और समाजी जिंदगी के मद्देनजर उन्होंने अवकाफ को काफी प्राथमिकता दी थी, लेकिन यह भी एक हकीकत है के जितने बड़े पैमाने पर लोगों ने जायदादें वक्फ की, उतने ही बड़े पैमान पर अवकाफ में मैनेजमेण्ट की कमी रही है । मुगलों के दौर में भी अवकाफ की हिफाजत और तरक्की के लिए कोई बकायदा विभाग नहीं था । इतना जरूर था कि उन्होंने निजामे अवकाफ को तरजीह देते हुए मुतावल्लियों को उनकी देखरेख का जिम्मा दिया था, जो शरिअत के जानकर और ईमानदानर थे, लेकिन इसके बावजूद भी अगर वो कोताही करते थे तो उन्हें ओहदे से बर्खास्त कर सजाएं भी दी जाती थीं ।
निजामें औकाफ और मुसलमानों की कोच्चिच्चें
हिन्दुस्तान में ईस्ट इंडिया कम्पनी के आने के बाद सन! १९६५ तक अवकाफ की हिफाजत और तरक्की के लिए कोई जाब्ता कायम नहीं था, ना ही कोई बकायदा व्यवस्था थी । उस दौर में मुतावल्ली बेलगाम हो चुके थे और खौफे खुदा भी उनके कल्बों से खत्म हो चुका था । लिहाजा वक्फ जायदादें बेयारोमददगार हो चुकी थी, कोई उनका पूछने वाला नहीं था। ऐसे हालत में अंग्रेजी हुकूमत की बुरी नजर भी वक्फ इमलाक पर पड़ी और उसने अवकाफ पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया । हद्दे इन्तेहां यहां तक पहुंची के उन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद को अपने अस्तबल में तब्दील कर दिया । इस पर मिल्लत के सब्र का बांध टूटने लगा और उन्होंने ऐसी बेजा हरकत पर आवाज उठाना शुरू की । लिहाजा वक्फ जायदाद की बाजयाबी के लिए जद्दोजहद शुरू हुई । पहली बार त्तमहनसंजपवद ग्सग् वि १८१० वि ठमदहंस ब्वकमए त्महनसंजपवद टसए १८१७ वि डंकतें ब्वकमए के जरिये अवकाफ के मामले में मुदाखलत शुरू करते हुए बहुत से जिलों में अवकाफ ठवंतक वि त्मअमदनम - ठवंतक वि ळवउउमतबम कायम किये गये और अवकाफ की जायदादों को उनके मातहत किया गया । यह पहला मौका था कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस तरह पहली बार कानून बनाकर अवकाफ की देखरेख का जिम्मा ठवंतक त्मअमदनम को दिया । उस दौरान १८५७ का गदर हुई, जिसके बाद तरतानिया राज कायम हुआ । फिर १८६३ में त्म्स्प्ळस्व्न्ै म्छक्व्ॅडम्छज्ै ।ब्ज् बना, जिसके तहत अंग्रेजों ने वकफ जायदादों के उनके ट्रस्टी और मुन्तजमीन के सुपुर्द किया ।
बरतानिया के दौरे हुकूमत में अवकाफ में मुदाखलत का मातला १८९४ में पेच्च आया, जब उत्तर -पच्च्िचम बंगााल के सिल्हट जिले के ।इनस थ्ंजंी डवीए सेीां टे त्नेंउवल क्ीनत ब्ीवनकींतल ;ब्ंस ग्टप्प्प्ए३९९ए१८९४ए२२एस्।.७६द्ध के मामले में ''वक्फ अलल औलाद'' को गैर कानूनी करार दे दिया गया । यह तब्दीली शरई कानून में नाकाबिले कुबूल मुदाखलत रखती थी । लिहाजा मुस्लिम लीग के लीडर सर सैय्यद अहमद,मोहहम्मद अली जिन्हा वगैरह की कयादत में एहतेजाज शुरू हुआ । चूंकि १९०६ में मुस्लिम लीग का कयाम अमल में आ चुका था, सारे मुसलमान मुस्लिम लीग के बैनर तले जमा होने लगे थे । ऐसे हालात में इंडियन नेच्चनल कांग्रेस को मुसलमानों के दरम्यान अपना मकामवमर्तबा खतरे में नजर आने लगा । लिहाजा इंडियन नेच्चनल कांग्रेस ने भी इस मुद्दे के तहत विरोध शुरू करते हुए २५-२९ दिसम्बर १९०६ को अपने २५वें इजलास में मुसलमानों के इस मजहबी मामले में अंग्रेजी हुकूमत की मुदाखलत के खिलाफ सियासी फोरम के जरिए आवाज बुलंद की और करारदात पास की, जिसमें बरतानिया हुकूमत से प्रीवीकाउंसिल के इस फेसले की जांच कमीच्चन के जरिये कराये जाने की मांग की । एक तवील अरसे तक जद्दोजहद करने के बाद मो.अली जिन्हा ने इस सिलसिले में ७ फरवरी १९१३ को पार्लियामेण्ट में एक बिल पेच्च किया, जिसे इत्तेफाके राय से पास कर दिया गया । इसके बाद ७ मार्च १९१३ को वक्फ ॅुंि टंसपकंजपदह ।बज १९१३ की शक्ल में अमल में लाया गया, जिसके तहत वक्फ अलल औलाद को कानूनी दर्जा हासिल हो गया।
सन् १९११ में देहली के अवकाफ फिर बरतानिया सरकार के कब्जों की नजर होने लगी, जिसमें सैकड़ों गांव और मसाजिदें शामित थी । वजह थी राजधानी का कलकत्त से देहली स्थानान्तरण होना। हुकूमत के इन कब्जों को लेकर मजीद एहतेजाज शुरू हुआ । लिहाजा हुकूमत ने इस दौरान जितनी भी मसाजिदें एकवायर की थीं, उसने इन मसजिदों का मुआवजा देने की पेच्चकच्च की, जिसे सुन्नी मजलिसे अवककाफ ने मुस्तरद कर दिया । ब्रिटिच्च हुकूमत ने गासिबाना रवैया अपनाते हुए वक्त जायदादों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया, जिसमें मस्जिदें भी शामिल थीं । इस पर जबरदस्त एहतेजाज हुआ, जिसके नतीजे में उन्होंने मस्जिदों को शहीद न करते हुए मुसलमानों को नमाज अदा करने की इजाजत दे दी । यह वोह दौर था जब देहली में मुस्लिम लीग की हुकूमत थी । उस दौर में मुसलमानों को नमाज अदा करने की इजाजत तो मिल गई, लेकिन इस शर्त के साथ कि मस्जिदों की मरम्मत और तामीरवतौसिअ हुकूमत की इजाजत के बगैर नहीं की जा सकेगी ।
हिन्दुस्तान की आजादी के बाद आजाद हिन्दुस्तान की खुद साख्ता हुकूमत की पॉलिसी में बहुत बड़ी तब्दीली रूनुमा हुई । मुसलमानों के बड़े तबके की तरफ से यह मांग उठायी गई के अवकाफ की तरक्की ओर हिफाजत के लिए कोई जाब्ता मुकर्रर किया जाये । इस सिलसिलें में मौलाना अबुलकलाम आजाद की कोच्चिच्चें काबिले जिक्र हैं, जिन्होंने पॉर्लियामेण्ट में इस ताअल्लुक से बिल पेच्च किया, जिसे काजमी साहब ने कानूनी जामा पहनाया, जिसे हम काजमी बिल के नाम से जानते है । इसी बिना पर १९५४ में वक्फ एक्ट बना और जो जारी भी हुआ, जिसके तहत वक्फ का सर्वे रजिस्ट्रेच्चन वक्फ के बेहतर निजाम के लिए जाबते मुकर्रर किये गये । इस एक्ट में जो कमियां थीं, उनको दुरूस्त करने के लिए मुस्लिम मेम्बर ऑफ पार्लियामेण्ट ने एक होकर आवाज उठायी । इस पर हुकूमते हिन्द ने वक्फ इंक्वारी कमेटी का कयाम किया । वक्फ इंक्वारी कमेटी की सिफारिच्चों को कुबूल करते हुए १९५५ में नया वक्फ एक्ट बनाया गया, जो हिन्दुस्तान की कुछ रियासतों को छोड़कर बाकी तमाम रियासतों में १ जनवरी १९९६ से जारी है ।
७० की दहाई में उस वक्त के वक्फ मिनिस्टर जनबा फखच्च्रूद्दीन अली अहमद ने मुजफ्फर हुसैन बर्नी की सदारत में बर्नी कमेटी की तच्च्कील की । बर्नी कर्मटी ने तहकीकवतफतीच्च के बाद सरकार को यह सिफारिच्च पेच्च कि की के सरकार ऐसी तमाम वक्फ जायदाद और मस्जिदों को देहली वक्फ बोर्ड के जेरे इंतेजाम कर दे । बर्नी कमेटी की यह सिफारिच्च कुबूल भी की गई, लेकिन इससे पहले कि इस पर अमल हो पाता सन् १९७७ में सियासी तब्दीली के बाइस इस पर कोई अमल नहीं हो पाया।
उसके बाद पार्लियामेन्ट के दोनों ऐवानों के ३० मेम्बरान की ( ज्वॉइन्ट पार्लियामेन्टरी कमेटी ) वक्फ बोर्ड की कारकरदगी की जांच और कुछ खास नुक्तों पर जांच के लिये बनायी गई है, जिसमें - (१) मुल्क में मौजूद वक्फ मिलकियत की पहचान, तहकीक और जांच करना । (२) मुल्क में वक्फ पर जो नायायज कब्जे हुए हैं उनकी जांच और पहचान कर उनसे कब्जे वापिस लेने के लिए मच्चवरे देना । (३) ऐसी वक्फ जायदादें, जो नाजायज तरीके से खुर्दबुर्द कर दी गयी है, उनकी जांच और पहचान करना और ये पता लगाना कि उनके लिये कौन जिम्मेदार है और उनकी वापिसी के लिये सलाह और मच्चवरा देना । (४) वक्फ जायदादों के सही इस्तेमाल के लिये सलाह देना । (५) सेन्ट्रल वक्फ काउंसिल और सुबाई वक्फ बोर्ड की काय्र करदगी की जॉंच करना और मॉजूदा वक्फ कानून को प्रभावच्चाली बनाने के लिये जरूरी तरमीमात करना ।
जस्टिस सच्चर की सदारत में मौजूदा मरकजी हुकूमत ने मुसलमानों की शैक्षणिक, आर्थिक, समाजी, पसमान्दगी पर जो रिपोर्ट पेच्च की है, उसमें हिन्दुस्तान में लगभग ५ लाख रजिस्टर्ड औकाफ की हिफाजत ओर तरक्की के लिये जो मच्चवरे दिये गये हैं उनमें -(१) मौजूदा वक्फ कानूनों में जरूरी तरमीमात की जाये । (२) आई.ए.एस. और आई.पी.एस. की तरह इंडियन वक्फ सर्विस कायम किया जाये कि इसे लिए मरकजी वक्फ काउंसिल और सुबाई वक्फ बोर्डो के अफसरान को मुकर्रर किया जाये । (३) और इसी तरह नेच्चनल वक्फ बोर्ड इन्स्टीट्यूट कायम किया जाकर वक्फ बोर्ड के मुलाजिमों की ट्रेनिंग की जाये, जिससे वक्फ की हिफाजत के इदारों से सही नतीजे हो सके ।
गौर करने का मुकाम है कि औकाफ के ताल्लुक से इतने अहतेमाम और जाबता बन्दी के बावजूद आज वक्फमिल्किसत कर बुरा हाल है । हुकूमत की तरफ से कन्द्रीय वक्फ बोर्ड, जिलई वक्फ कमेटियां बनायी जाती है । कौसिंल और उसमें सियासी मफाद को सामने रखकर मुस्लिम नुमाइन्दों को मुकर्रिर किया जाता है । और जिम्मेदारी के मन्सब और ओहदे दिये जाते हैं, जिन्हें न औकाफ के ताल्लुक से जरूरी मालूमात होती है और न ही उन्हें इस जिम्मेदारी का अहसास होता है । इसलिए वो औकाफ के ताल्लुक से ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले पाते हैं । हक और इख्तियार होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं । वक्फ मिल्कियत की हिफाजत नहीं हो पाती है और न ही वक्फ का नच्चोनुमा होता है ।
आज जरूरत इस बात की है के मिल्लत बेदार हो ऐसे निजाम की मां हूकुमत से करे कि मुल्क तमाम मुसलमानों को अपने औकाफ की हिफाजत और तरक्ककी के लिये इन्तेखाब के जरिये मुल्क, सुबाई और जिलाई सतह पर बॉडी और नुमाइन्दा कमेटी बनाने का इख्तेयार दिया जाये । इस तरह वक्फ जायदादें मुसलमानों के इख्तेयार और कब्जे में दी जाये ताकि उनका सही मसरफ और इस्तेमाल किया जा सके और इस तरह अवकाफ अपने हकीकी मकसद-मिल्लत की तरक्की फलाह और बहबूद को पूरा कर सकें ।
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