वक्फ इमलाक और हमारी जिम्मेदारियॉं
औकाफ की शरई नौइयत
(सादिकुर्रहमान फैजी कान्हींवाड़ा जिला सिवनी)
औकाफ वक्त की जमा हैं जिसका मायना होता हैं मुकम्मल तरीके से किसी चीज को किसी खास मकसद के लिये किसी के सुपुर्द या हवाले कर देना ।
इस्तिलाह में औकाफ से मुराद वो जायदादें कृषि भूमि, तामीरात, बागात, कुऐं वगैरह हैं जो मसाजिद, मदारिस, इदारे, अंजुमनों के लिये वक्फ किये जाते हैं । जिनसे उनके इखराजात का इन्तेजाम होने के साथ-साथ उनकी आमदानी का इस्तेमान कोमवमिल्लत की फलाह व बहदूद के लिये भी किया जाए शरियत में इसकी बड़ा महत्व और सािन है ।
इस्लाम की तबलीग व दावत और इस्लाहे मआच्चरा, गुरबत,और व इफलास, मोहताजी, तंगदस्ती के निवारण और तालीम व तरबीयत के मैदान में मिल्लत व समाज की माद्दी जुरूरीयात की पूर्ति में औकाफ का अहम किरदार और रोल रहा है जिसके शवाहिद और तरगीबात कुरआन और हदीस व सहाबा इकराम राजि.केजुदोसखावतऔरफैय्याजीकेऐसेवाक्यातदस्तायाबहोतेहै।
चुनान्चे कुरआन मजीद की सूरह आले इमरान में हजरत मरियम अलै. की वालिदा मोहतरमा इमरान की बीबी का वाक्या मजकूर जिसमें उन्होंने अपनी होने वाली औलाद को बैतूलमुकद्दस की खिदमत और अल्लाह की इबादत के लिये वक्फ करने की नजर मानी थी। तर्जुमाः- और (ये वाक्या भी काबिले जिक्र है ) जबकि इमरान की बीबी ने दुआ की ऐ मेरे रब मैं इस बच्चे को जो मेरे पेट में हैं मेरे लिये नजर करती हूं कि वो तेरी इबादत के लिये वक्फ होगा-इसे मेरी तरफ से कुबूल फरमा - बेच्चक तू सुनने और जानने वाला । (सूरह आले इमरान आयत नं. ३५)
मोहम्मद बिन इसहाक कहते हैं कि इमरान की बीबी याने मरियम अलै. की मॉ को हमल करार नहीं पाता था उन्होंने दुआ की कि ऐ अल्लाह मुझे बेटा अला कर अल्लाह ने उनकी दुआ कुबूल कर ली जब हमल करार पा गया तो उन्होंने नजर मानी कि बच्चे को इबादत और बैतूलमुकद्दस की खिदमत के लिये बिल्कुल फारिग कर दूंगी ।
हदीस में अल्लाह के रसूल सल्ल. ने वक्फ के अमल को सदका ए जारिया के लफ्ज से ताबीर फरमाया है । हजरत अबूहुरैरा रजि. से हदीस मरवी हैं । (हजरत अबुहूरैरा राजि. से रिवायत हैं कि हुजूर सल्स. ने फरमाया कि जब इन्सान की वफात हो जाती है तो उसके आमाल का सिलसिला खत्म हो जाता है । मगर तीन आमाल ऐसे है जिनके सवाब मिलने का सिलसिला बंद नहीं होता ) (१) सदका एक जारिया (२) ऐसा इल्म जिससे फायदा हासिल किया जाए (३) नेक औलाद जो उसके लिये दुआ करे । सरवरे कायनात सल्ल. के फरमान का मतलब वाजेह है की तीन आमाल ऐसे है जिनका अज वा सवाब बंदे की मौत के बाद भी उसको मिलता रहेगा इनके अलावा तमाम आमाल के अजरवसवाब के मिलने का ताल्लुक खत्म हो जाएगा वो तीन अमाल ये है :
१. सदकाए जारिया :- यानी ऐसा सदका जिससे आवाम निरंतर फायदा हासिल करते रहे और इसका सवाब भी निरंतर सदका करने वाले को मिलता रहे - जैसे कुआ खुदवा देना, मुसाफिरखाना बनवा देना, मदारिस का कयाम याा मदारिस मसाजिद रिफाही काम करने वाली अंजुमना और खिदमते खल्क के मकसद से कायम शुदा इदारों वगैरह के लिए कृषि भूमि जायदाद या दीगर असबाब व जराए उपलब्ध और वक्फ करना । अगर बन्दाएखुदा ने अपनी हयात में ये अमल किया हे तो जब तक लोग इससे फायदा हासिल करते रहेंगे मरने के बाद भी उसको इसका सवाब मिलता रहेगा ।
ज्नबा मौलाना शैखुल हदीस उबैदुल्लास साहब रहमानी ने मरआतुल मफातीह शरह मिच्च्कातुल मसाबीह में सदकाए जारिआ की तफसील औकाफ से ही किया यानी सदकाए जारिया से मुराद औकाफ ही है ख्वाह वो रजिस्टर्ड हो या गैररजिस्टर्ड।
छूसरा ये कि इंसान इक्ल्म की दौलत छोड़कर इस दुनिया से रूख्सत होता है यानि कोई ऐसी किताब लिख दी जो आवामुन्नास की इस्लाहे दारेन का जरिया बनी हो या अपने शागिर्दो का तवील सिलसिला छोड़ा हो तो जब तक लोग इस किताब से इल्म हासिल करते रहेंगे इसका सवाब उसको मिलता रहेगा ।
तीसरा ये कि मरने वाले ने अपनी तरबियतयाफता नेक और सालेह औलाद छोड़ा हो जो औलाद उसके लिए मगफिरत की दुआएॅंक रही हो । ये आयाते करीमा ओर अहदिसे रसूल सल्ल. से ये बात वाजेह है कि इस्लामी शरियत में औकाफ कि क्या अहमियत और मुकाम है कि खुदावंदेताआला इस अमल के अजवसवाब को कयामत तक या जब तक वक्फ बाकी हैं जारी रखता है ।
इस बाबत मजीद दो तीन हदीसें मुलाहिजा फरमाएॅ - १. बज्जार ने हजरत अनस राजि. से रिवायत किया है कि जिसमें सात आमाल ऐसे है कि जिनका सवाब बंदे को उसकी मौत के बाद जब कि को कब्र में होगा मिलता रहेगा । जिसने इल्म सिखया, नहर खुदवाया, कुआं खुदवाया, दरख्त लगवाया, मस्जिद बनवाई, किताब छोड़कर मरा (यानि कोई किताब तसनीफ की) नेक लड़का छोड़कर मरा जो उसके मरने के बाद उसकी बख्शिच्च के लिए दुआए। करे (बज्जार) । यह हदीस पूर्व कथित हदीस की तफसीर है ।
२. हजरत असद बिना उबादा रजि. बयान करते हे कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल. मेरी वालिदा का इंतेकाल हो गया है लिहाजा (उन के हक में ) कौन सा सदका अफजल है ? चुनांचे उन्होंने ने कुऑं खुदवाया और कहा कि यह सअद की मॉं की तरफ से है ।
३. हजरत अनस रजि. आए और कहने लगे कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल. मेरी मॉं का इंतेकाल हो चुका है और उन्होंने कोई वसीयत नहीं की थी मैं अगर उनकी तरफ से सदका करूॅ ंतो क्या उनको कुछ फायदा पहुंचेगा । आपने फरमाया हॉ तुम लोगों को पानी पिलाओं ( तिबरानी) इस हदीस से यह बात मालूम होती है कि मरने के बाद भी वारिसीन मैयत की तरफ से सदका या सदके की शक्ल में वक्फ कर सकते है जिसका सवाब मैयत को मिलता रहेगा यह हकीकत है कि इस्ताम कलील मुद्दत में चहार दहांगे आलम में फैला और फरोग पाया इसकी पुच्च्त में सहाबा और साहबियात राजि. के यही वक्फ करने वाले अमल ओर इस ताल्लुक से जोदवसखावत के अमली मजाहिर नजर आते है ।
साहाबा ओर सहाबियात रजि. ने दीने इस्लाम के फरोग और मिल्लत के आर्थिक और समाजी व्यवस्था की दुरूस्तगी के लिए यहॉं तक कि ऐसे दरपेच्च मसाइल जिनका हल आर्थिक मदद के बगैर नहीं हो सकता था अपना नक्द रूपया और जायदादें अल्लाह की खातिर पेच्च किया और वक्फ किया। सहाबाएकराम और साहबियात की इस राह में अजीम कुरबानियों और सुखावतों की चन्द झलक मलहूजेखातिर हों -
१. हजरत खरीजतुलकुबरा बरा रजि. तिहारत पेच्चा दौलत मंद खातून थीं ऑंहजरत सल्ल. से आपका जब निकाह हुआ और जब आपको नुबूवत के ताज से नवाजा गया तो इस्लाम की दावत व तबलीग के मिच्चन को जो तकवियत मिली और नबी सल्ल. अपने इस मिच्चन की तकमील के लिए आर्थिक तौर पर बेफिक्र होकर कुल्ली तौर पर मसरूफ हो गए इसके पीछे आपकी बीवी हजरत खदीजा रजि. की आर्थिक मदद की पेच्चकच्च ही कार फरमा थी ।
२. मुसलमान जब मक्का से हिजरत करके मदीना तच्चरीफ लाए वहॉ पानी की किल्लत और तकलीफ हुई यहूदी का मीठे पानी का एक कुऑं था हजरत उस्मान ने उसे खरीद कर ३५ हजार दिरहम में मुसलमानों के लिए वक्फ कर दिया । इसी तरह हजरत उस्मान रजि. ने ही अजवाजे मुताहरात के कमरों की तामीर के लिए मस्जिदें नबवी के किनारे जमीन खरीदकर दी । मस्जिदे नबवी की तौसी में भी अपने अपना माली तावुर दिया । मस्जिदे नबवी जिस जगह बनाई गई है वो दो यतीम लड़कों की थी जो असअद बिन जरारा की निगरानी में थे । इन यतीम लड़कों ने कीमत लेने से इन्कार किया और कबीलाएबनु नज्जार ने चाहा कि इसकी कीमत अदा करने की इजाजत उन्हें मिल जाए लेकिन नबी सल्ल. ने दोनों बातें मंजूर न फरमाई जमीन की कीमत १० दीनार तय हुई और नबी सल्ल. ने यी कीमत हजरत अबूबक्र रजि. से दिलवा दी जिसमें मस्जिद बनाई गई जिसका तूल १०० गज था ।
सुरः आले इमरान आयत ९२'' तुम नेकी के मुकाम को हरगिज नहीं पा सकते जब तक तुम उन चीजों को खर्च न करो जो तुमको प्यारी है'' नाजिल हुई तो हजरत अबु तलहा रजि. नबी सल्ल. की खिदमत में हाजिर हुए और अर्ज किया कि ऐ अल्ला के रसूल सल्ल. अल्लाह ने यह फरमान नाजिल फरमाया कि तुम नेकी और भलाई को नहीं पा सकते जब तक अपनी महबूब और पसन्दीदा चीज अल्लाह की राह में खर्च ना करो तो मेरी सारी जायदाद में मुझे सबसे ज्यादा महबूब और पसन्दीदा ये बीरहा बाग है । (जिसमें आंहजरत सल्ल. तच्चरीफ ले जाया करते थे और उसका पानी बड़ी रगबत से पीेते थे ) मैं अल्लाह की राह में सदका करता हूं आप जिस तरह मुनासिब समझें मसरफ में लायें ।
३. हजरत अली रजि. अगरचे पहले अजहद गरीब थे यहां तक कि पेट पर पत्थर बांधे रहते थे फिर बाद में अल्लाह ने बहुत बड़ी जागीर और दौलत दी और उन्होंने अजीमुच्च्च्चन वक्फ भी किया इससे ४०,००० दीनार सालाना आमदानी हुआ करती थी। इमाम नव्वी रह. ने इससे मुराद जकात नहीं लिया । बल्कि वक्फ की आमदनी बतलाया है बहरहाल कुछ भी हो ४०,००० दीनार सालाना सखावत बड़ी काबिले कद्र सखावत है काच्च कि आज के अमीर भी इससे कुछ सबक आमोज हो इस तरह के वाक्यात से सीरते सहाबा रजि. की तरीख भरी पड़ी है ।
कौमी फलाह व बहबूद के लिए औकाफ का इस्तेमाल
दौलत और वित्तीय स्थायित्व के बगैर कौमी फलाहवबहबूद की कल्पना नहीं की जा सकती वित्तीय भौतिक और आर्थिक कौम और माच्चरे के विकास व उरूज के लिए ऐसी ही हैसियत रखनी हैं जैसी इन्सानी जिस्म को खड़े रखने और कायम करने में रीढ़ की हड्डी । यह हकीकत हैं जिससे इनकार नहीं किया जा सकता इसलिए शरियत में इनफाकफीसबीलिल्लाह की बहुत ज्यादा तरगीब दी गई है बखालत ( कंजूसी) से बचने का हुक्म दिया गया है अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया कि बखालत से बचो इसलिए कि बखालत ने तुम से पहले लोगों को बर्बाद कर दिया है । बफज्ले खुदा हमारे असलाफ (पूर्वज) जिनके कुलूब कौमी हमदर्दी के जज्बों से लबरेज थे और जिन्होंने कौम को सरबुलंद करने का ख्वाब देखा था इस ख्वाब को हकीकत में तबदील करने के लिए अपनी मिलकियतों को अल्लाह के वास्ते वक्फ किया । उनके ख्याल व तसव्वुर में यकीनी तौर पर हमदर्दी थी हम जो इमलाक वक्फ कर रहे हैं वो किसी इदारे, अंजुमन मस्जिद के जेरे नगीं हो जिससे उसकी बेहतर तरीके से निगेंहदाच्च्त हो सके और उसका सही मसरफ हो नीज हमारे लिए सदका-ए-जारिया हो ।
लेकिन कौमी भलाई व विकस के वो अजीब उद्देच्च्य जिनके हुसूलवतकमील के लिए सदाका-ए-जारिया के लफज की शक्ल में शरई हैसियत से वक्फ का अमल वजूद पजीर हुआ । जो अब सिर्फ मसाजिद मकाबिर के इखराजात और इंतेजामात के महदूद दायरे में सिमट के रह गए हैं । मुतावल्ली हजरात ज्यादा से ज्यादा औकाफ की आमदनी से मसाजिद के अइम्मा और मुअज्जिन के वेतन और दीगर इन्तेजामात को मसारिफ समझ बैठे हैं बाज मसाजिद में तो पेच्च इमाम मुअज्जिन मुदरिस के इतेंजामात भी गायब हैं या हैं तो तनखा माकूल नहीं और दीगर इंतेजामात भी इत्मेनान बख्श नहीं हैं, ये समस्या वहां का नहीं जहां आमद कम हैं बल्कि जहां कसीर आमदनी हैं वहां भी यही च्चिकायत मिलती हैं ।
औकाफ मीरास नहीं जिसे अपनी मिल्कियत समझी जाए या तक्सीम या फरोख्त की जाए या उसकी आमदनी को अपनी आमदनी समझी जाए । अल्लाह के रसूल सल्ल. ने इस ताल्लुक से वाजेह हिदायत फरमाई हैं चुनान्चे बुखारी वा मुस्लिम की तवील हदीस हैं जिसका तर्जुमा पेच्च ए खिदमत है'' इब्ने उमर रजि. से रिवायत है कि हजरत उमर रजि. ने खैबर में कुछ जमीन हासिल की आप उसके मुताल्लिक हुक्म लेने के लिये नबी सल्ल. के पास आए कहा के रसूल सल्ल. मैंने खैबर में कुछ जमीन पाई है और इससे पहले मैंने कभी कोई माल नहीं पाया जो इससे बेहतर हो आप सल्ल. ने फरमाया अगर लू चाहे तो इसकी अस्ल को रख छोड़े और इसके हासिलच्चुदा आमद को खैरात करता रहे हजरत अब्दुल्लाह रजि. ने कहा उमर रजि. उसकी पैदावार खैरात करते रहे । ये नहीं था कि उसका अस्ल फरोख्त किया जाएगा या हिबा में दे दिया जाएगा या विस्से में चला जाएगा इसको फकीरों, अपने कराबतदारों और गुलामों के आजाद करने कराने में और अल्लाह की राह पर मुसाफिरों और मेहमानों पर खैरात करते रहे और इसमें किसी मुतावलली के लिये हर्ज नहीं जो इसे मालूम के तौर खाए । (यानी जरूरत के मुताबिक) और किसी दोस्त को खिलाए । लेकिन वो इसे अपना माल बनाकर रखने वाला ना हो ओर बुखारी की रिवायत में यूॅं कि आप सल्ल. ने फरमाया कि इसके असल को वक्फ रखों जो न बेचा जाएगा और ना ही हिबा किया जाएगा लेकिन इसका फल अल्लाह की राह में खर्च किया जाएगा ।
इस हदीस से सिर्फ ऐसे मुतवल्ली के लिए जो अपना सारा वक्त या कुछ वक्त औकाफ की निगरानी में लगता हैं ओर उसका दूसरा जरियाए माअच्च भी नहीं तो वो अपनी जरूरत के मुताबिक उससे ले सकता है रियायत और गुन्जाइच्च मिलती है ।
दूसरी बात इस हदीस से वाजेह होती है की औकाफ मीरास नहीं है जिसे तकसीम कर दिया जाए वारसैन में मुतवल्ली हजरात इसके सिर्फ मुहाफिज निगरा अमानतदार है और इस अमानत का तकाजा यही है कि इसको इससे वसीतर कुच्चादा मसरफ में लाया जाए जो समझाया जा रहा है । मजकूच्च बाला हदीस में एक मसरफ फीसबीलिल्लाह भी बताया गया है ।
कुरआन की इस्तिलाह में जो काम दीन व मिल्लत की हिफाजत के लिए किया जाए फीसबीलिल्लाह में दाखिल है । दीन व मिल्लत के आम मफाद पर जैसे कुरआन की तालीम और उलूमें दीनिया व असरिया का इनतेजाम जो खालिस खिदमते खल्क के जज्बे से हो फीसबीलिल्लाह के मफहूम में शामिल है नवाब सिद्दीक हसन खॉ भोपाली ने अपनी तफसीर फताहुल बयान में फीसबीलिल्लाह को गजवा व जिहाद में ही महसूर नहीं किया बल्कि तमाम खैर और भलाई और मसालेह उम्मत के कामों को भी फीसबीलिल्लाह में दाखिल किया है जैसे हिफाजत और दिफा के सामान और पुल वगैरह की तामीरात भी शामिल है ।
लिहाजा अव्वल तरीन जिम्मेदारी है कि जहां औकाफ की मिल्कियत बेसरोसामानी और बेहिफाजत है उनकी हिफाजत की जाए और उनको काबिले जरिया आमदनी और कारआमद बनाकर उनका भी इस्तेमाल किया जाए ।
खुलासा कलाम ये की औकाफ से उम्मत की खैर व फलाह के तमाम काम कर सकते हैं उनमें कुछ जरूरी कामों की तरफ इच्चारा करना मुनासिब समझता हूं ।
अक्सर मसाजिद में मकतब की शक्ल में मदरसे चल रहे हैं जहां सिर्फ व सिर्फ कुरआन नाजरा की तालीम हो रही है वो भी कमाहक्कहु नहीं इन मकातिब की तौसी करके उनको ऐसे मदारिस की शक्ल दी जाए जहां कुरआन नाजरा की तालीम के साथ-साथ इब्तिदाई तौर पर कुरआन के तरजुमें की भी तदरीस का इन्तेजाम हो और असरी तालमी कम से कम प्रायमरी दर्जे तक दी जाती हो जहां औकाफ की आमद ज्यादा हो वहॉ हाईस्कूल और हॉयर सेकेन्डरी स्कूल की तालीम दी जा सकती है और अगर जिलई सतह पर तमाम मुतवल्लियान मुत्तफिक और मुत्तहिद हो जाए तो अपने अपने औकाफ के जरिये सब मिलकर ऐसे कॉलेज का भी कायम कर सकते हैं जहॉं मुख्तलिफ रोजगार की फुनूनी तालीम व सनत व हरफत की तालीम व तरबीयत का इन्तेजाम किया जा सकता है अलावा अजीं जिलई सतह पर और भी रिफाही व फलाही काम किया जा सकता है ।
मुकामी सतह पर मसाजिद में लाइब्रेरी का कयाम और मोहल्ला पड़ोस गांव के आवाम के लिये कलीलुलमुद्दत च्चिफाखानों का कयाम जहां दिन में एक दो घंटे किसी डॉक्टर की खिदमत लेकर इलाज का इन्तेजाम किया जा सकता हैं अगर जरूरी हो तो डॉक्टर को उसका मुआवजा भी दिया जाए औकाक फन्ड से गरीब मरीजों की तिब्बी इमदाद की जाए । औकाफ के जरिए होनहार जेरेतालीम तलबा जो गरीबी की वजह से अपनी तालीम मुकम्मल नहीं कर सकते या ख्वाहिच्च के मुताबिक आलातालीम हासिल नहीं कर सकते उन्हें तालीमी वजीफा दिया जाए । अच्छे नम्बरों से कामयाब होने वाले तुलबा की हौसला अफजाई के लिए इनामात तकसीम करने का एहतेमाम किया जाए।
ऐसी मसाजिद जहां जरियाऐआमदनी नहीं हैं । वहां इमाम व मुदर्रिस की तन्ख्वाह में तावुन किया जाए । औकाफ के जेरे एहतेमात सेहत के मराकिज का कयाम किया जाए जहां कौम व मिल्लत के जवान वर्जिच्च करें और अपनी सेहत व तन्दरूस्ती बनाएॅं । ऐसी छोटी तस्ती या गांव जहां पानी की किल्लत हो वहां पानी का इन्तेजाम, कुऑं खुदवाकर या बोरिंग कराकर किया जाए ।
इन तमाम कामों के अलावा वो काम जो मिल्लत के मसालेह व फवाइद के लिए किये जा सकते हैं किए जाएॅं क्योंकि ये सब फीसबीलिल्लाह में दाखिल हैं । इन तमाम उमूर को अहसन और बेहतर इज्तिमाइ तरीके से अन्जाम देने के लिये जिलई वक्फ बोर्ड कमेटी के अलावा अलैहदा से जिलई सतह पर मुतवल्लियान कमेटी तच्चकील दी जाए जिसमें तमाम मसाजिद और औकाफ के मुतावल्लियान हजरात की नुमाइन्दगी जरूरी रखी जाएॅं । इन मजकूरा कामों को ये कमेटी बाहमी तआवुन व मच्चवरों से अन्जाम दे और अपने औकाफ के मसाइल जो वक्फ बोर्ड में जेरे समाअत और काबिले गौर है उनके हल के लिये जद्दोजहद और कोच्चिच्च करें ।
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